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Monday, September 23, 2013

देश के खस्ताहालत के बीच खाद्य सुरक्षा बिल क्या जरुरी है.




2014 को लोक सभा चुनाव को नज़र में रकते हुए कांग्रेस का खाद्य सुरक्षा बिल सोमवार पास हो गया.पिछले वर्ष के शीतकालीन सत्र से मानो सरकार बस इसी बिल को कानून बनाने के पीछे तत्पर थी। और हो भी क्यों न, यही बिल तो कांग्रेस को पुनः सत्ता में वापस ला सकता है। जिस प्रकार पिछली बार ऋण माफ़ी से करिश्मा हुआ था इस बार भी उनकी यही अपेक्षा है। अन्यथा क्यों इस बिल को चुनाव से 6 माह पूर्व लागू कराया जा रहा है।
जबकि यूपीए सरकार ने तो इसे सत्ता (२००९) में आने के १०० दिन के अन्दर लागू करने का वादा किया था ? पर अगर राजनीति को अलग रख कर देखें तो क्या वास्तव में हमें इस बिल की कोई आवश्यकता है? हाँ सुनने में तो ये बिल बहुत ही हितकारी लगता है। एक ऐसे देश में जहाँ पर विश्व के सबसे अधिक भूखे लोग रहते हैं, उस जगह पर इस कानून से बेहतर और क्या हो सकता है? सबको आहार मिलेगा, कोषागार में रखा अनाज नष्ट नहीं होगा और किसान भी खूब तरक्की करेंगे। पर हकीकत इतनी सुहावनी नहीं है। खाद्य सुरक्षा कानून बन जाने से देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिलेगा।
देश में बढ़ते भ्रष्टाचार को देख के अब नहीं लगता की सरकार की ओर से बनाया गया कोई भी बिल अब आम जनता के हित में है और उनके लिए लाभ दायक है।

अगर आकार को देखा जाये तो विश्व के एक तिहाई भूखे लोग भारत में रहते है.
कांग्रेस के शासन में बहुत कम ही ऐसी योजना बनी है जो सफल रही है,अगर सरकार सच में ये योजना आम जनता के लिये बनाई है तो इसे सीधा आम लोग के बीच वितरित करे जिससे इस योजना में कोई दलाली या घोटाला न हो सके ठीक उसी तरह जैसे घरेलू गैस में किया जाता है.

रुपया हर दिन रिकार्ड गिरावट दर्ज कर रहा है। हमारा वित्तीय घाटा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है,और यहां पर नया विदेशी निवेश भी न के बराबर हो गया है।अर्थविशेषज्ञों के मुताबिक इन सब के लिए हमारी कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था ज़िम्मेदार है,और इस स्थिति में वो खाद्य सुरक्षा बिल का माली बोझ सँभालने योग्य नहीं है। क्योंकि हमारे पास इसे चलाने के लिए तो कोई धन है नहीं । सहजतः हमें इसके लिए ऋण लेना पड़ेगा और इससे हमारा वित्तीय घाटा और अधिक बढ़ जायेगा।
सरकार को चाहिए कि वो इस बिल को इस तरह संतुलित करे कि गरीबों का पेट भी भर जाये और साथ ही में अर्थव्यवस्था को भी हानी न पहुंचे।



Tuesday, August 28, 2012

क्या कमल और पंजे पे भाड़ी पड़ेगी अन्ना की राजनीती ?



भारत में आंदोलोनो का इतिहस रहा है जब जनशैलाब सडको पर उतरी है कुछ बड़ा बदलाव हुआ ही है । जे पी  आन्दोलन सभी को याद होना चाहिए जिसने जनता के अधिकार के लिए सत्ता पार्टी जन विचारो को झकझोर दिया था और एक अमुल चुल बदलाव आया था। अन्ना  आंदोलोन को  इस नज़रिये से देखना कोई गलत नहीं होगा,लेकिन ये जन आन्दोलन के लिए था जो की बाद में जाकर  भ्रष्टाचारो के मुद्दे को भी आगे लेकर बढ़ी। इसी आंदोलोन के दौरान सत्ताधारियों का भी कहना था की अगर हम जन लोकपाल  बिल पास करने में असफल है तो क्यूँ न  टीम अन्ना अपनी सर्कार बना के इस बिल को पास कराए। यह एक हास्यपद विचार है जो जनता को कहती है की अगर कुछ संसोधन करना हो या विचारो को लागु करवाना हो तो सड़क पर मत उतरो बल्कि राजनीती में आओ।इस तरह के विचारो और बयानों से हम अंदाज़ा लगा सकते है की इन राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा कैसी हो सकती है ।
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों रास्ट्रीय स्तर  की पार्टिया आज हासिये पर नज़र आती है संप्रग  सरकार कांग्रेस आज हर स्तर पर जनता की कमर तोड़ राखी है । आज स्थिति किसी की भी  अच्छी नहीं है चाहे वो निम्न परिवार हो मध्य या फिर उच्च वर्ग का महंगाई डाइन सबको खाए जा रही है । भला जनता के पास भी कोई विकल्प नहीं है जब कांग्रेस कुछ उम्मीद की आस इनके बाच जगाये तो जनता इन्हें सत्ते में ले आती है और अगर कांग्रेस असफल  रह गई तो बाज़ी  भाजपा मर लेती है । दोनों पार्टियों की राजनीती बिलकुल एक ही समान है पहले जनता को लूटो और जब समय चुनाव का आए तो जनता को खाद सुरक्षा बिल जैसे लुभाने वाली प्रोग्राम परोश कर अपनी तरफ खीच लेती है । अन्ना  ने तो तीसरे मोर्चे का एलान कर दी । अब सवाल ये है की  क्या टीम अन्ना ,भाजपा ,कांग्रेस जैसे विकल्प तो नहीं पेश करेगी ? क्या टीम अन्ना जनता के उमीदो पे खड़े हो पायेगी ?
अन्ना ने जनता का विचार लेकर राजनैतिक  विकल्प देने का एलान किया जहा तक सवाल जनता का विचारो का है तो इतने कम समय में ये नामुमकिन सा लगता है। अन्ना ने ये बात भी कही थी अगले डेड सालो तक देश में घुमेंगे और लोगो को जागरूक  करेंगे । अन्ना का राजनीतिक  विकल्प देना तब कामयाब साबित होगा जब अन्ना गाँव गाँव तक लोगो को जागरूक करने में समर्थ होंगे और वो इस अभियान में काफी हद तक सफल भी रहे है । इसका उदाहरण  है  अनशन के पहले ही दिन किसानो का मौजुद होना ।
बात जहा तक जन लोकपाल की है तो अब ये और भी मुश्किल हो गया है क्यूंकि अन्ना द्वारा राजनीतिक पार्टी का विकल्प देना एक तरह से उनके टीम का राजनीतिक ज़मीन पर उतरना है और ये सत्तारुद  दल शुरू दल शुरू से चाहती थी । राजनीतिक विकल्प के लिए हामी भरना कांग्रेस काफी फायदेमंद साबित होगा क्यूँकी जन लोकपाल के लिए जो आन्दोलन उन पर बार बार प्रहार कर रही थी अब वो समाफ्त हो चुकी है और राजनीतिक रूप में बदलने जा रही है ।
अब तो बस देखना ये है की क्या टीम अन्ना एक भ्रष्ट मुक्त उम्मीदवार जनता के बीच ला पाएंगे ? क्या कमल और पंजे पे टीम अन्ना की राजनीती भाड़ी पड़ेगी ?