Tuesday, April 7, 2015

शिक्षा की शान नालंदा

न्यू इंडिया मासिक पत्रिका के अप्रैल अंक में नालंदा पर छपा मेरा एक लेख
कर्नाटक के मैसूर निवासी 30 वर्षीय मैक्ने डेनियल बंगलुरू में 30,000 रुपए प्रति माह की नौकरी कर रहे थे, लेकिन उन्होंने नौकरी छोड़ दी और बिहार की नालंदा विश्वविद्यालय के पहले सत्र 2014-16 में पारिस्थितिकी और पर्यावरण विषय के पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला ले लिया. इसके लिए उन्हें सालाना 3,00,000 रुपए खर्चने पड़ेंगे. वह कहते हैं, ‘गौरवशाली अतीत वाले इस विश्वविद्यालय का हिस्सा बनना, किसी सपने के सच होने जैसा है.’
  • भूटान निवासी नवांग तो भूटान विश्वविद्यालय में बाकायदा डीन के पद पर कार्यरत थे. उन्होंने दो साल की छुट्टी ली और बतौर स्टुडेंट नालंदा विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में अध्ययन के लिए दाखिला लिया है. एक अन्य स्टुडेंट जापान के अकिरोनारा मुरा कहते हैं, ‘नालंदा पवित्र भूमि है, जिससे उनकी आस्था जुड़ी है.’
  • कोलकाता की सना सला हों या दिल्ली के अरुण गांधी,  देश- विदेश के विभिन्न हिस्सों से आए स्टुडेंट यहां एडमिशन करा कर फख्र महसूस कर रहे हैं. वैसे यहां दाखिला लेना इतना आसान भी नहीं था. वाइसचांसलर डॉ. गोपा सभरवाल के मुताबिक, पीजी में दाखिले के लिए करीब 1,500 आवेदन आए थे. लेकिन विश्वविद्यालय के निर्धारित मानदंडों पर 15 लोग खरे उतरे हैं, जिनको दाखिला दिया गया है. 

यह वही नालंदा विश्वविद्यालय है, जो दुनिया भर में शिक्षा केंद्र के रूप में विख्यात रहा और जिसे 821 साल पहले बख्तियार खिलजी की आक्रमणकारी सेना ने तबाह कर दिया था. 1 सितंबर 2014 को यह दोबारा खुला और नए सत्र की शुरुआत दो कोर्स- पारिस्थितिक की और पर्यावरण तथा इतिहास अध्ययन के 15 स्टुडेंट्स और 11 फैकल्टी मेंबर्स के साथ हुई थी.


गौरवशाली इतिहास
बिहार की राजधानी पटना से कुछ 100 किलोमीटर की दूरी पर नालंदा जिले में बना नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है. 450 ईस्वी. में इसकी स्थापना हुई थी. नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त ने की थी. स्थापना के बाद इसे सभी शासक वंशों का समर्थन मिलता गया. महान शासक हर्षवर्धन ने भी इस विश्वविद्यालय के लिए खुले हाथ दान दिया. इस विश्वविद्यालय को विदेशी शासकों की भी सहायता मिली.
सम्राट अशोक तथा हर्षवर्धन ने यहां सबसे ज्यादा मोनेस्टी और मंदिरों का निर्माण करवाया. यहां की सभी इमारतों का निर्माण लाल पत्थर से किया गया है. आज भी आप इस विश्वविद्यालय की मुख्य दो मंजिला इमारत देख सकते हैं.
माना जाता है कि शायद यहीं शिक्षक अपने छात्रों को संबोधित किया करते थे. यहां एक प्रेयर रूम आज भी सुरक्षित अवस्था में है. इसमें भगवान बुद्ध की स्टैचू रखी हुई है. मंदिर नंबर 3 से इस पूरे क्षेत्र का विशाल नजारा दिखाई देता है. यह बुद्ध का मंदिर है, जिसमें कई छोटे-बड़े स्तूप हैं, जिनमें भगवान बुद्ध के स्टैचू आपको देखने को मिलेंगे.
अध्ययन केन्द्र
ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध यहां कई बार आए थे, इसीलिए पांचवी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक इसे बौद्ध शिक्षा के केंद्र के रूप में भी जाना जाता था. सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग भी यहां रिर्सच करने आए थे. उनके तमाम लेखों में यहां की अध्ययन प्रणाली, अभ्यास और मठवासी जीवन की पवित्रता का बेहद रोचक वर्णन मिलता है.
 यह दुनिया का पहला आवासीय अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय था. जहां दुनियाभर के तकरीबन 10,000 छात्र अध्ययन करते थे और इसी विश्वविद्यालय में रहते भी थे. यहां 2000 शिक्षक पढ़ाते थे. यहां आने वाले विद्यार्थियों में बौद्ध यात्रियों की संख्या ज्यादा थी.
संग्रहालय
विश्वविद्यालय परिसर की विपरीत दिशा में एक छोटा-सा पुरातत्वीय संग्रहालय बना हुआ है. यहां खुदाई से प्राप्त अवशेषों को रखा गया है. इसमें भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियों का अच्छा-खासा संग्रह है. साथ ही बुद्ध की टेराकोटा मूर्तियां और प्रथम शताब्दी का दो जार भी इस संग्रहालय में रखा हुआ है.
  इसके अलावा तांबे की प्लेट, पत्थर पर खुदा अभिलेख, सिक्के, बर्तन तथा 12वीं सदी के चावल के जले हुए दाने रखे हुए हैं. नव नालंदा महाविहार एक शिक्षण संस्थान है. इसमें पाली साहित्य तथा बुद्ध धर्म की पढ़ाई एवं अनुसंधान होता है. यह एक नया संस्थान है. इसमें दूसरे देश के छात्र भी अध्ययन करने आते हैं.
मेमोरियल हॉल
ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल एक नवनिर्मित भवन है. यह भवन चीन के महान तीर्थयात्री ह्वेनसांग की याद में बनवाया गया है. इसमें उनसे संबंधित चीजें तथा उनकी मूर्ति देखी जा सकती है. नालंदा विश्वविद्यालय के जलने के बाद उससे जुड़े अधिकांश दस्तावेज समाप्त हो गए थे. ह्वेनसांग ने यहां से पढ़ाई करते हुए तथा उसके बाद इसके बारे में जो कुछ लिखा, उससे हमें इस महान स्थान के बारे में काफी जानकारी मिल पाई.
800 साल बाद...
1 सितंबर, 2014 को प्राचीन और आधुनिक भारत के इतिहास के बीच ज्ञान की टूटी कड़ी एक बार फिर जुड़ गई. लगभग 800 साल बाद नालंदा विश्वविद्यालय (एनयू) फिर से शुरू हुआ. उम्मीद तो थी कि इस आयोजन पर अस्थायी परिसर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्राचीन नालंदा महाविहार के खंडहर रूप बदल कर जी उठेंगे, लेकिन ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं.
  विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गोपा सभरवाल कहते हैं कि छात्रों की संख्या कम ज़रूर है, लेकिन क्योंकि इसे एक शोध संस्थान के रूप में विकसित किया जा रहा है, लिहाजा यहां अन्य संस्थानों की तरह भीड़ की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.
  विश्वविद्यालय में फिलहाल, दो विषयों (स्कूल ऑफ़ हिस्टोरिकल स्टडीज और स्कूल ऑफ़ इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट) की पढ़ाई की अस्थाई व्यवस्था की गई है और सात शिक्षक नियुक्त किए गए हैं. 2014-15 के पहले सत्र के लिए जापान और भूटान के एक-एक छात्र और भारत के विभिन्न राज्यों के 13 छात्र-छात्राओं ने अपना नामांकन कराया है.
 विश्वविद्यालय में शिक्षण शुल्क तीन लाख रुपए सालाना है, लेकिन वर्तमान बैच को फीस में 50 प्रतिशत की छूट दी गई है. साथ ही विश्वविद्यालय की ओपन युनिवर्सिटी में फिलहाल हर विषय की पढ़ाई चल रही है.

Saturday, April 4, 2015

हर रंग कुछ कहता है...



होली के दिन कोई कपड़े पर रंग डाल जाता है, तो दिल दुखता है. जबकि दिल को खुश होना चाहिए कि किसी ने रंग डालने योग्य तो माना.   - ओशो

 
रंग हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं. रंगों के माध्यम से ही हम अपने भावों को, दुनिया की रंगीनीयत को, इस कायनात और उसमें बिखरे कलर को देख, समझ पाते हैं. इन्हीं के चलते हमें प्रकृति की हरियाली, सूरज की सुनहरी रोशनी, आसमान का नीलापन,बादलों की काली घटाएं और चंद्रमा का उजलापन अपनी मूल रंगत में दिखता है. इन्हीं से बादलों में खिंची सात रंगों की इंद्रधनुषी रेखा, उसमें खिले हर रंग की ऐसी सुंदर कहानी बयां करती है, जिसे देखकर मन खुद रंगीन हो उठता है. पर प्रकृति में बिखरे ये रंग हमारी जिंदगी में 'कलर' के रूप में तभी चढ़ते हैं जब हम इनकी पहचान कर, खुद को इनसे जोड़ पाते हैं.


रंग क्या हैं
रंग  दुनिया को कलरफुल बनाते हैं. संसार की हर चीज में रंग है. पानी, हवा, अंतरिक्ष और पूरा जगत ही अपनी एक रंगत लिए हुए है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस रंग की पहचान हम कितना और कैसे कर पाते हैं. अब सफेद रंग को ही ले लें, तो कई लोग कहते हैं कि सफेद कोई रंग नहीं होता. इसी बात को दूसरे शब्दों में कहें, तो कह सकते हैं कि अगर कोई रंग नहीं है, तो वह सफेद है. लेकिन सच तो यह है कि सफेद रंग में सभी रंग शामिल हैं. क्योंकि सफेद को आप जिस किसी भी रंग में ढालो, वह उसी रंग का हो जाएगा. हम कह सकते हैं, रंग वही नहीं है, जो दिखता है, बल्कि वह भी रंग ही है, जो बदलता है, अपने अस्तित्व को छोड़ खुद को दूसरे रंग में ढाल लेता है. सफेद रंग आंखों को ठंडक देता है और खुद को शांत रहने के लिए भी प्रेरित करता है. 
  अगर हम गौर करें, तो दुनिया के रंगमंच पर हर इनसान किसी न किसी रंग की शरण लिए हुए है, और उसी के हिसाब से सबकी अलग-अलग भूमिकाएं हैं. साधु-संन्‍यासी भगवा रंग में, समाज सेवी सफेद रंग में,  सुनहरे परदे पर अभिनय कर रहे हीरो-हीरोइन रंग-बिरंगे कपड़ों में इसी लिए नजर आते हैं कि सभी ने खुद को किसी न किसी एक रंग में रंग लिया है, पर क्या हमने खुद को किसी रंग के हवाले किया? शायद नहीं...  इसलिए इस बार रंगों के त्यौहार होली पर दूसरों को रंगने से पहले जान लें कि रंग कहते क्या हैं? फिर इन्हीं रंगों के हिसाब से खुद को किसी एक रंग में ढालें जरूर. उससे पहले जानें क्या कहता है होली का हर एक रंग. 

लाल: लाल रंग प्यार का रंग है. यह रंग हम में उत्साह और साहस का भाव पैदा करता है. खुद को लाल रंग में ढालें यानी खुद को प्यार के रंग में ढालें. आपके अन्दर इतना प्यार हो कि आपको देख दूसरों को प्यार आए. आप इतने उत्साह से भरे हों कि अगर आपको देख उनके दिन की शुरुआत हो, तो उनका दिन जोश, उत्साह और उल्लास के साथ बीते. इस होली ईर्ष्या को छोड़ प्यार से रहें.

हरा: आज की भागमभाग वाली जिंदगी में सुकून और ताजगी पहुंचाने वाला रंग है हरा. सुबह की ठंडक में जब हम अपने आसपास की हरियाली को देखते हैं, तो हमारी आंखों को सुकून मिलता है. शीतलता, ताजगी लाने वाले हरे रंग में सराबोर होने के बाद अगर हम महसूस कर सकें तो नई ताकत का एहसास होगा, सोच सकारात्मक होगी. खुद को इस रंग में ढाल कर के देखें ताकि जब लोग आपको देखें तो उन की आंखों को सुकून मिले, उनके मन से आपके लिए सिर्फ सकारात्मक सोच ही बाहर आए.

नीला: नीला रंग सबको समाहित करके चलने का रंग है. अपने आसपास नजर डालें, तो पाएंगे कि संसार में हर वह चीज जो विशाल है, उसका रंग आमतौर पर नीला है, चाहे आकाश हो या समंदर. ओशो कहते हैं कि नीला रंग आध्यात्मिक रंगों में से एक है,  क्योंकि वह शांति और मौन का रंग है. वह स्थिरता, विश्राम और लीन होने का रंग है. जब भी आप गहन शांति में होते हैं, तब आप अपने अंदर एक नीली ज्योति महसूस करेंगे और यदि आप अपने भीतर नीली ज्योति का भाव महसूस करेंगे,तो आप एकदम शांत होंगे. यह रंग दोनों तरह से काम करता है. यह रंग मौन का रंग है.

पीला: पीला रंग पवित्रता का एहसास कराता है. यही वजह है कि हर धार्मिक कार्य में इसका इस्तेमाल किया जाता है. यह काफी शुभ रंग माना जाता है. पीला रंग मिलन और आत्मीयता का प्रतीक है. इस रंग की तरह खुद को मिलनसार बनाएं, खुद को बांध कर न रखें. मन को पवित्र रखें. ताकि लोगों के बीच रह कर आप खुद की और ओरों की सोच को सकारात्मक बना रहने दें, न कि नकारात्मक.

गेरुआः इस रंग को देख हमारे दिन की शुरुआत होती है. सुबह-सुबह जब सूरज निकलता है, तो उसकी किरणों का रंग केसरिया होता है, जिसे भगवा, गेरुआ या नारंगी रंग भी कह सकते हैं. यही रंग है जो हमारे जीवन में एक नया सवेरा लाने को प्रेरित करता है. खुद को इस रंग में ढालें ताकि सूरज की पहली किरण के साथ आप खुद को और औरों के जीवन में भी एक नए सवेरा ला सकें, उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें.

काला: अगर आपके मन में काले रंग को लेकर कोई भी नकारात्मक सोच है, तो उसे पहले दिल से निकालें. एक बात जान लें कि प्रकृति के किसी भी रंग में निगेटिव एनर्जी नहीं होती. अगर ऐसा होता तो रात काली नहीं होती. प्रकृति कभी काले रंग को नहीं अपनाती. फिर लोग काले बाल, काली आंखों से आकर्षित नहीं होते, ऐसी न जाने कितनी वजहे हैं. तो सबसे पहले आप अपने मन से काले रंग को अशुभ न मानें, बल्कि इस रंग को शक्ति और ताकत मानें.

प्रकृति खुद को विभिन्‍न रंगों में अभिव्यक्‍त करती है और व्यक्‍ति प्रकृति के इन्हीं रंगों के माध्यम से अपनी संवेदनाओं,भावनाओं और पसंद को व्यक्‍त करता है. रंग अपनी ओजस्विता और प्रकाश के द्वारा मानव मस्तिष्क एवं शरीर को प्रभावित करते हैं. तो इस साल रंगों के त्यौहार में खुद को किसी एक रंग में ढाल के देखें.
  न्यू इंडिया हिन्दी मासिक पत्रिका के मार्च अंक में  स्पिरिचूअल पर मेरा एक लेख 


Sunday, February 22, 2015

कलमकार के 'युवा कविता महोत्सव' में छाईं रही महिलाएं


अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के सफल आयोजन के बाद कलमकार फांउडेशन के तत्वावधान में साहित्य अकादमी में ' युवा कविता महोत्सव' के तहत 'कविता अभी,बिल्कुल अभी' का आयोजन का सफल हुआ. जिस में लगभग दर्जन भर कवि- कवयित्रियों ने शिरकत की. आयोजन का विषय प्रर्वतन करते हुए कथाकार संजय कुंदन ने हिंदी को प्रतिरोध की भाषा बताते हुए कहा कि हिंदी की कविताएं पूलतः राजनीति केंद्रित हैं,पर महोत्सव ,जिसमें महिला कवयित्रियों का बोलबाला था , ने     प्रेम,परिवार,समाज,संबंध,दु:ख,अनुभव,प्रकृति केंद्रित कविताओं का पाठ कर यह जता दिया कि कविता के स्तर पर हिंदी सियासत से आगे बढ़ गई है. जिस में रसोई चिंतन व आव्जर्वेशन भी शामिल है.महोत्सव की शुरुआत अर्चना राजहंस मधुर की कविताओं से हुई जिसे राश्मि भारद्वाज,रेणु मिश्रा,सुजाता शिवेन,रमेश प्रजापति,आकांक्षा पारे काशिव,सुधा उपाध्याय,लंदन से आई शिखा वार्ष्णय,मुकेश कुमार व पवन करण ने अपनी अपनी कविताओं से अंजाम तक पहुंचाया. महोत्सव में अतिथि के रूप में पहुंचे तेजेंदर सिंह लूथरा ने हिंदी कविता के प्रतिरोध की कविता मानने से मना कर दिया.'जिस के समर्थन में उन्होंने अपनी कुछ कविताएं भी सुनाई. श्रोताओं के विशेष आग्रह पर संजय कुंदन ने भी अपनी कविताएं पढ़ी. महोत्सव का संचालन चरचित आलोचक व कलमकार से जुड़े अनंत विजय ने किया वही फाउंडेशन के अध्यक्ष संजीव पालेवाल ने युवा कविता महोत्सव में आमंत्रित कवियों की पढ़ी गई रचनाओं का एक संकलन प्रकाशित करने की भी बात कहीं. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात कथाकार डॉ भगवान दास मोरवाल ने की इस अवसर पर एनजीओ कल्चरल पर लिखें गए उनके उपन्यास 'नरक मसीहा'का लोकार्पण भी हुआ. कलमकार....एक समूह ऐसे लोगों का जो मानते हैं कि शब्द ही अभिव्यक्ति का आवरण हैं. कलमकार एक गैर सरकारी और गैर मुनाफा संगठन है जो भारतीय भाषाओं के प्रचार और प्रसार के लिए प्रयत्नरत् है. इसके लिए कलमकार सेमिनार, विचार मंथन कार्यक्रम, संगोष्ठियां आदि का आयोजन करता है. कलमकार मानता है कि आने वाले वर्ष हिंदी के वर्ष होंगे और वो समय दूर नहीं जब हिंदी विश्व भाषा के रूप में न सिर्फ स्थापित होगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई भी जाएगी. यूं भी भारत के गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में शिक्षा की बहु भाषा प्रणाली चलन में है और वहां हिंदी का प्रयोग सेतु भाषा, यानी दो क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संपर्क स्थापित करने वाली भाषा के तौर पर हो रहा है.


 
 
 
 
 

Monday, October 7, 2013

"इन्टरनेट -युग में मुद्रित माद्यमों की स्थिती और चुनौतियों" पे हुई एक संगोष्टी

सात अक्तूबर दिन सोमवार,समय सुबह के दस बजे, पत्रकारिता के छात्रों से भरा परा कला संकाय का कमरा नंबर २२. अदिति महाविद्यालय एवं हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय के सहयोग से "इन्टरनेट -युग में मुद्रित माद्यमों की स्थिती और चुनौतियों" पर चार दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्टी का कार्यक्रम  की शुरुवात हुई जिसका उद्घाटन प्रो.हरी मोहन सर,अध्यक्ष हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय ,टी के अरुण संपादक इकॉनोमिक टाइम्स,डॉ कल्पना भरारा प्राचार्य अदिति विश्व विद्यालय और प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी कलकत्ता विश्वविद्यालय ने दीप जला के किया.संगोष्टी में वरिष्ट पत्रकार राहुल देव भी मौजूद थे.संगोष्टी की शुरुवात प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने किया विषय था अखबार तंत्र और विचारधारा,चतुर्वेदी जी ने बहुत ही अच्छी तरह से अपने विचारों को रखा और बहुत ही कम शब्दों में अपनी बात खत्म की,उनका कहना था आने वाले समय में प्रिंट का वितरण कम होती नज़र आएगी इंटरनेट के युग में आज कोई पाठक नहीं बल्कि एक लेखक है जो हर कही लिखता रहता है चाहे हो ब्लॉग हो या सोशल साईट फेसबुक. टेक्नालजी दिन पे दिन बढती जा रही है नए-नए टेक्नालजी आ रही है जिसे लोग पसंद कर रहे है समाज बदल रहा है उनका कहना था पहले गांव की लड़की अगर किसी अनजान लड़के से दो बातें कर लेती थी तो उसके घर वाले पहाड़ खड़ा कर देते,उससे सवाल पे सवाल करते थे,पर आज समय कुछ और है आज हर लड़की के पास अपना खुद का मोबाइल फोन है जिसमे वो कम से कम दस लड़को का फोन नंबर रखती है और बेहिचक बात भी करती है .वही इकॉनमिक टाइम्स के संपादक टी के शरण जी विषय से थोड़ा अलग हो के “अखबारों पर पूँजीवाद का राज” इस सोच को बदले, इसे विषय बनाते हुए छात्रों के सामने अपने बातों को रखा.वरिष्ट पत्रकार राहुल देव जी का कहना था की समाचार पत्र धीरे धीरे भविष्य में खत्म हो जायेगा,जो की हमारे समाज के के लिए खतरे की बात है.
इसी तरह समय कम होने की वजह से पहले दिन का समापन हुआ.

Monday, September 23, 2013

देश के खस्ताहालत के बीच खाद्य सुरक्षा बिल क्या जरुरी है.




2014 को लोक सभा चुनाव को नज़र में रकते हुए कांग्रेस का खाद्य सुरक्षा बिल सोमवार पास हो गया.पिछले वर्ष के शीतकालीन सत्र से मानो सरकार बस इसी बिल को कानून बनाने के पीछे तत्पर थी। और हो भी क्यों न, यही बिल तो कांग्रेस को पुनः सत्ता में वापस ला सकता है। जिस प्रकार पिछली बार ऋण माफ़ी से करिश्मा हुआ था इस बार भी उनकी यही अपेक्षा है। अन्यथा क्यों इस बिल को चुनाव से 6 माह पूर्व लागू कराया जा रहा है।
जबकि यूपीए सरकार ने तो इसे सत्ता (२००९) में आने के १०० दिन के अन्दर लागू करने का वादा किया था ? पर अगर राजनीति को अलग रख कर देखें तो क्या वास्तव में हमें इस बिल की कोई आवश्यकता है? हाँ सुनने में तो ये बिल बहुत ही हितकारी लगता है। एक ऐसे देश में जहाँ पर विश्व के सबसे अधिक भूखे लोग रहते हैं, उस जगह पर इस कानून से बेहतर और क्या हो सकता है? सबको आहार मिलेगा, कोषागार में रखा अनाज नष्ट नहीं होगा और किसान भी खूब तरक्की करेंगे। पर हकीकत इतनी सुहावनी नहीं है। खाद्य सुरक्षा कानून बन जाने से देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिलेगा।
देश में बढ़ते भ्रष्टाचार को देख के अब नहीं लगता की सरकार की ओर से बनाया गया कोई भी बिल अब आम जनता के हित में है और उनके लिए लाभ दायक है।

अगर आकार को देखा जाये तो विश्व के एक तिहाई भूखे लोग भारत में रहते है.
कांग्रेस के शासन में बहुत कम ही ऐसी योजना बनी है जो सफल रही है,अगर सरकार सच में ये योजना आम जनता के लिये बनाई है तो इसे सीधा आम लोग के बीच वितरित करे जिससे इस योजना में कोई दलाली या घोटाला न हो सके ठीक उसी तरह जैसे घरेलू गैस में किया जाता है.

रुपया हर दिन रिकार्ड गिरावट दर्ज कर रहा है। हमारा वित्तीय घाटा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है,और यहां पर नया विदेशी निवेश भी न के बराबर हो गया है।अर्थविशेषज्ञों के मुताबिक इन सब के लिए हमारी कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था ज़िम्मेदार है,और इस स्थिति में वो खाद्य सुरक्षा बिल का माली बोझ सँभालने योग्य नहीं है। क्योंकि हमारे पास इसे चलाने के लिए तो कोई धन है नहीं । सहजतः हमें इसके लिए ऋण लेना पड़ेगा और इससे हमारा वित्तीय घाटा और अधिक बढ़ जायेगा।
सरकार को चाहिए कि वो इस बिल को इस तरह संतुलित करे कि गरीबों का पेट भी भर जाये और साथ ही में अर्थव्यवस्था को भी हानी न पहुंचे।



Saturday, August 31, 2013

"सत्याग्रह " एक अच्छी रियलिस्टिक फिल्म बनते-बनते रह गई

देशभर में बढ़ते भ्रष्टाचार पर उठ रही आम जनता की आवाज की कहानी पे बनी ये फिल्म अन्ना हजारे के वो तेराह दिनों की याद दिला देता है जिसने भारत की जनता को जागरूक कर दिया.अन्ना हजारे का करप्शन के खिलाफ अनशन और जन लोकपाल आंदोलन, जो उन्होंने देशभर में जगाया। लेकिन अच्छी खासी कहानी को झा कही और ही ले गए.

फिल्म की शुरुवात होती है भोपाल के अंबिकापुर से.द्वारका उर्फ दादूजी अमिताभ बच्चन अंबिकापुर में उसूलों वाले स्कूल टीचर हैं, जो ना सिर्फ अपने उस उसूल पे चलते है साथ ही साथ लोगों को भी उन उसूलों पे चलने की शिक्षा देते है.मानव यानी अजय देवगन उनके बेटे के दोस्त रहते है.सिस्टम को लेकर मानव और द्वारका दोनों के विचार अलग होते है और इसी पे दोनों पे बहस भी होती है जिसके कारण मानव रात को ही उनका घर छोड़ देता हैं.फिल्म की असली शुरुवात तब होती है जब द्वारका कलेक्टर पर हाथ उठाने के लिए गिरफ़्तार कर लिया जाता है.मानव मदद के लिए आता है और एक युवा नेता अर्जुन रामपाल है अमृता राव के साथ सोशल कैंपेन शुरू करता है, जिसे लीड कर रहे होते हैं द्वारका जो सरकार की चाल-ढाल को साफ करने और आम आदमी को और पॉवरफुल बनाने की डिमांड करता है।

उनकी ये मुहिम में जान तब आती है। जब ABP की टीवी पत्रकार यास्मीन अहमद यानी करीना कपूर खां इसकी रिपोर्टिंग करती है। झा सारे इवेंट को ठीक उसी तरह जोड़ते है जैसे अन्ना के आन्दोलन के समय हुआ था अरविन्द केजरीवाल से अन्ना का जुड़ना,मनीष सिसोधिया,कुमार विश्वास और पूर्व आईपीएस किरन बेदी का अन्ना को समर्थ देना सब कुछ ठीक उसी कि तरह चलता है कि यही पे बॉलीवुड का रंग नज़र आ जाता है और आन्दोलन को छोड़ झा मानव और यास्मीन के बीच रोमांस दिखा देते हैं। 'सत्याग्रह’ की शुरुआत रियलिस्टिक फिल्मों की तरह होती है पर एक घिसी पिटी कहानी की तरह खत्म हो जाती है..
( एक तरह से मुझे लगता है की ये फिल्म चुनाव के पहले लोगों को “आप” का इतिहास बता रही है और उनका चुनाव प्रचार कर रही हैं.)    

Sunday, June 23, 2013

रांझाना में है एक नयापण..

बनारस के घाट और बनरस गलियों के साथ ए आर रहमान की मृन्दंग संगीत फिल्म में  पहले ही  जान डाल देती है. कुंदन (धनुष ) एक तमिल पंडित परिवार का बेटा पहली ही नज़र में एक मुस्लिम परिवार की लड़की जोया (सोनम कपूर) से सत्रा तप्पर खाने के बाद उसके  इश्क में डूब जाता है,ये बचपन का प्यार परवान चढ़े ,उससे पहले जोया को बनरस के गलियों से दूर कर दिया जाता है.कुछ सालो बाद जब कुंदन का प्यार यानि जोया वापस बनारस आती है, तब बहुत कुछ बदल चूका होता है,बचपन की जोया बड़ी हो गई होती है पर इस बात से कुंदन अंजान रहता है की उसकी जोया अब उसकी नहीं किसी और की है, पर कहता है न "ये इश्क नहीं आशान एक प्यार का दरिया है बस डूब ही जाना है" हालात कुछ ऐसे हो जाते है की न कुंदन को उसकी जोया मिल पाती है और न ही जोया को उसका प्यार..
कब कुंदन बनारस की गलियों को छोड़ दिल्ली के राजनीती दलदल और एक प्रेमी अपना पश्यताप करते  करते अपनी सांस गवा बैठता है ये देखने लाइक होती है..
फिल्म के डायलॉग और एक बेहतरीन लव स्टोरी के साथ मस्त कॉमेडी तरका भी लगाया गया है जो  आपको हसने के लिये मजबुर कर देता है,एक नयापन आपको इस मिलेगी आपको इस फिल्म में ,कुछ ऐसी ही है निर्देशक आनंद की रांझाना है,संगीत धमाल और कहानी में नयापन...धनुष,सोनम कपूर और अभय देओल ने ने फिल्म में एक अच्छे किरदार और अच्छी मेहनत की है. ए आर रहमान के संगीत ने फिल्म में और भी जान डाल दिया  है ..